भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ : - ( PART 2 )
इस युग में धातु शिल्प ,वस्त्र निर्माण, आभूषण कला, हाथी दांत उद्योग, जहाज उद्योग, बर्तन उद्योग की विशेष उन्नति हुई
इस युग में शिल्पी हो तथा व्यापारियों ने अपने अपने संग बना रखे थे
गुप्त काल में आंतरिक एवं वैदिक व्यापार दोनों उन्नत है चीन, लंका, इंडोनेशिया, जावा, सुमित्रा, रोम आदि से व्यापार होता था
22. ( राजस्व के स्रोत ) - भाग, भोग , ऊपरीकर एवं उद्योग आदि राजस्व के स्रोत थे
23.( फाह्यान का भारत वर्णन ) - चीनी यात्री फाह्यान ए 399 से 414 ईसवी तक भारत का भ्रमण किया उसने भारत की आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक स्थिति का वर्णन किया है
24.( हर्षवर्धन की विजयें ) - हर्ष में 606 ईसवी से 647 ईसवी तक शासन किया उसने वल्लभी के राजा को पराजित किया
और बंगाल तथा पूर्वी भारत को विजित किया
उसने सिंध के राजा को भी पराजित किया, उसने औडू और कंगोद पर भी विजय प्राप्त की
25.( हर्ष का धर्म व ज्ञान के सरंक्षक के रूप में मूल्यांकन ) - हर्ष एक महान सेनापति कला साहित्य धर्म का सरंक्षक था
उसने बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लिए कन्नौज में एक सभा का आयोजन किया उसके सरंक्षण में महायान बौद्ध धर्म का देश विदेश में प्रसार हुआ
हर्षवर्धन 5 वें वर्ष में प्रयाग में महा मोक्ष परिषद का आयोजन करता था जिसमें विभिन्न धर्मों के देवी देवताओं की पूजा की जाती थी एवं विभिन्न धर्मावलंबियों को दान दिया जाता था
26. ( प्रयाग सभा ) - 643 ईसवी में हर्ष ने प्रयाग में महा मोक्ष परिषद का आयोजन किया यह हर्ष की छट्टी सभा थी इस अवसर पर 500000 लोगों से भी अधिक उपस्थित हुए
इस सभा में बौद्धों, ब्राह्मणों, जेनों, निर्धनों, अहसायों आदि को उदारतापूर्वक दान दिया गया 
27. ( साहित्य के क्षेत्र में उन्नति ) - हर्ष स्वयं विद्वान था तथा विद्वानों का सरंक्षक था उसने नागानंद, प्रियदर्शिका तथा रत्नावली नामक ग्रंथ लिखे
उसके दरबार में मयूर, बाणभट्ट, मातंग दिवाकर, जय सेन, भृतहरि आदि उच्च कोटि के विद्वान थे
उसके समय में नालंदा, वल्लभी अधिक शिक्षा का प्रसिद्ध केंद्र था
28.( हर्ष का शासन प्रबंध ) - हर्ष एक उच्च कोटि का प्रशासक था उसका प्रशासन निरंकुश था किंतु लोगों को अपने अपने क्षेत्रों में स्वशासन प्राप्त था
29.( मंत्री परिषद ) - सम्राट की सहायता के लिए एक मंत्रीपरिषद का गठन किया गया राजधानी में एक सुव्यवस्थित सचिवालय था
30.( सेना ) - हर्ष के 5 हजार हाथी, 2000 घुड़सवार तथा 5000 पैदल सैनिक थे
31. ( साम्राज्य के भाग ) - हर्ष का साम्राज्य भुक्तियों, विषयों आदि में विभक्त था
32. ( कर ) - हर्ष के शासन काल में भाग "हिरंय" तथा बली नामक कर प्रचलित थे
33. ( दंड विधान ) - कानून तोड़ने पर अपराधियों को दंड दिया जाता था
शारीरिक दंड नहीं दिए जाते थे
34. ( ह्वेनसांग का भारत विवरण ) - ह्वेनसांग ने 629 से 644 तक हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत की यात्रा की थी उसके यात्रा वृतांत से तत्कालीन भारत की सामाजिक स्थिति, धार्मिक स्थिति, आर्थिक स्थिति, राजनीतिक स्थिति शिक्षा आदि के बारे में जानकारी मिलती है
35. ( चोल शासक ) - उर्वघहेरी, इलन जीत चेन्नी, चोल राजवंश का प्रथम शासक था करीकाल विज्याल्य, आदित्य प्रथम , राजराज प्रथम, राजेंद्र प्रथम, राजाधिराज प्रथम, आदि चोल वंश के प्रमुख शासक थे
इनमें राजराज प्रथम तथा राजेंद्र प्रथम पराक्रमी एवं शक्तिशाली राजा थे
इस वंश का अंतिम शासक राजेंद्र तृतीया 1279 में पांड्यों ने चोल राज्य पर अधिकार कर इसे समाप्त कर दिया
36.( चोल प्रशासन ) -
केंद्रीय प्रशासन - चोल शासन का स्वरूप राजतंत्र आत्मक वंशानुगत था राजा प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी था
37. ( सैन्य संगठन ) - चोलों की स्थाई सेना में पैदल, गजारोही, अश्वारोही आदि सैनिक शामिल थे चोलों के पास एक शक्तिशाली नौसेना थी
38. ( न्याय व्यवस्था ) - राजा सर्वोच्च न्यायाधीश होता था
न्याय के लिए नियमित न्यायालय का गठन किया गया था
39. ( राज्य की आय के स्रोत ) - राज्य की आय का मुख्य स्रोत भू राजश्व था इसके अतिरिक्त राजस्व कर, गृह कर, व्यवसाय कर , आदि कर भी प्रचलित थे
40. ( प्रांतीय प्रशासन ) - साम्राज्य विभिन्न प्रांतों में विभक्त था
जिन्हें मंडलम कहा जाता था इनका प्रशासक "मंडल मुंडाली" कहलाता था
41. ( स्थानीय प्रशासन ) - चोल प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता ग्रामीण एवं नगरीय स्तर पर स्थानीय स्वायत्तता की व्यवस्था थी जो प्रतिनिधि संस्थाओं उर, सभा, महासभा एवं नगरण के द्वारा संचालित होता था
42. ( चोल कला ) - चोल सम्राटों ने अनेक विशाल मंदिर बनवाए जिनका निर्माण द्रविड़ शैली के अंतर्गत हुआ
उनके द्वारा निर्मित मंदिरों में राजराज प्रथम का "गंगेकोंद्चोल्पुरम" तथा कोरंगनाथ , एरातेश्वर आदि उल्लेखनीय थे
इस काल में ब्रम्हा, विष्णु , नटराज , रजा - रानियों आदि की सुन्दर मूर्तियाँ भी बनायीं गयी
धातु मूर्तियों में नटराज शिव की काँस्य मूर्ति विशेष उल्लेखनीय हैं
43.(चोल साहित्य ) - चोल शासक शिक्षा एवं साहित्य के सरंक्षक थे तमिल एवं संस्कृत भाषाओं का प्रचलन था कमबन ने रामावतार की रचना की जयंगोंदार ने कलितुन्ग्परनी की रचना की
44.( कल्हण की राजतरंगिणी ) - कल्हण ने राजतरंगिणी की रचना की जिसमें कश्मीर का इतिहास वर्णित है इसमें महाभारत से लेकर सवयं अपने युग तक के कश्मीर के इतिहास का विवरण दिया गया है इसमें आठ तरंग तथा संस्कृत के कुल 7826 श्लोक है
कलंण की राजतरंगिणी संस्कृत में उपलब्ध उन रचनाओं में पहली महत्वपूर्ण रचना है जिनमें ऐतिहासिक इतिवृत्त की विशेषता पाई जाती है
कल्हण कृत राजतरंगिणी एक निष्पक्ष और निर्भय ऐतिहासिक कृति है
45.( विजयनगर साम्राज्य का उदय ) - विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 ईस्वी में हरिहर तथा बुक्का नामक दो भाइयों ने की
46. ( संगम वंश ) - हरिहर प्रथम, बुक्का प्रथम, हरिहर द्वितीय , देवराय प्रथम, देवराय द्वितीय, विरुपाक्ष द्वितीय, आदि इस वंश के प्रतापी शासक थे
47. ( सालुव वंश ) - 1485 में नरसिंह सलुव ने सालुव वंश की स्थापना की
48. ( तुलुव वंश ) - वीर नरसिंह ने तुलुव वंश की स्थापना की इस वंश का महानतम शासक कृष्णदेव राय था
जिसने 1509 ईसवी 1529 ईसवी तक शासन किया उसके शासन काल में विजयनगर साम्राज्य ऐश्वर्या और शक्ति की दृष्टि से अपने चरमोत्कर्ष पर था 1565 में तालीकोटा का युद्ध में मुस्लिम राज्यों की संयुक्त सेनाओं ने रामराय को पराजित कर विजयनगर साम्राज्य को खूब लूटा 1570 से 1650 ईसवी तक अरविंदो वंश ने शासन किया विजयनगर साम्राज्य धीरे-धीरे पतन की ओर उन्मुख होता गया
49. (सांस्कृतिक प्रगति ) - विजयनगर के शासकों ने साहित्य स्थापत्य कला चित्रकला संगीत कला को प्रोत्साहन दिया
उन्होंने विजयनगर साम्राज्य को सांस्कृतिक गतिविधियों का उत्कृष्ट केंद्र बना दिया
कृष्णदेव राय ने आयुक्तमालयदम नामक ग्रंथ लिखा उनके दरबार में तेलुगु साहित्य के 8 सर्वश्रेष्ठ कवि रहते थे
50. ( कला के क्षेत्र में उन्नति ) - विजयनगर के शासकों ने स्थापत्य कला के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया
कृष्णदेव राय ने विट्ठल स्वामी का मंदिर तथा देवराय द्वितीय ने हजारा मंदिर का निर्माण करवाया गोपुरम तथा मंदिर के स्तंभों के अलंकार पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया
विजयनगर के शासकों द्वारा अनेक महलों एवं राजप्रशादों का भी निर्माण कराया गया इनमें विभिन्न देशों के रहन-सहन को दर्शाया गया है चित्रकला के अतिरिक्त मूर्तियों का निर्माण भी इस काल में प्रचुर मात्रा में किया गया
51.(संगीत कला ) - कृष्णदेव राय के दरबार में अनेक प्रसिद्ध संगीतकार, गायक और नर्तक थे
सायन ने संगीत सार नामक पुस्तक लिखी लक्ष्मीनारायण ने संगीत सर्वोदय नामक पुस्तक की रचना की
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